तीर्थ यात्रा वृतांत
Author उषा किरण श्रीवास्तव
1 Aug 2021
संकलन : मेरी तरफ से
   
वैसे तो तीर्थ यात्रा दो तरह का होता है, एक जिसमें तीर्थ यात्री भगवान के प्रति समर्पित होते हैं, उन्हें किसी भी तरह के वातावरण या रहन-सहन का कोई प्रभाव नहीं पड़ता वे सिर्फ धर्म स्थल पर जाकर देवी-देवताओं का दर्श्न कर धन्य हो जाते हैं, परन्तु दूसरे तीर्थ यात्री गनतव्य स्थान या धर्म स्थल के वातावरण रहन-सहन का आनंद लेते हुए धर्म स्थलों पर दर्श्न कर संतुश्ट होते है। वैसे लोग जिज्ञासु प्रवृति के होते है। उन्हें देवी-देवताओं के एतिहासिक पृष्ठ भूमि के बारे में भी जानने की इच्छा होती है।
मेरा मन भी कुछ इसी तरह की धारणाओं से ग्रसित है, इसी प्रवृति के कारण मुझे भी घुमने की प्रबल इच्छा रहती है, चाहे पर्यटक स्थल हो या धर्म स्थल। 
इस बार मेरी यात्रा तीर्थ यात्रा में निकली है यह एक अजीबो-गरीब तीर्थ यात्रा है, इसमें सिर्फ महिलाओं की एक टीम है। इस टीम की लीडर (ग्रुप प्रधान) किशोरी दीदी है।
एका-एक शाम को मुझे किशोरी दीदी से भेंट हुई, वे धोबी के यहाँ कपड़ा लेने आई थी, जो समय पर न मिलने से परेशान थी। मैंने परेशानी का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि हमलोग कल (पवन एक्सप्रेस) गाड़ी से 15 दिनों के तीर्थ यात्रा पर जा रहे है। मुझे और भी उत्सुकता हुई, कुछ आष्चर्य भी हुआ। इतने दिनों की तीर्थ यात्रा और सिर्फ महिलाऐं? किशोरी दीदी ने सहज भाव से कहा कि हमने तो सभी तीर्थो का भ्रमण कर लिया और साथ में कई महिलाऐं को भी तीर्थ यात्रा करवाई है, अबकि तो बेटी की मन्नत उतारनी है, चिन्ता की कोई बात नहीं है, सब जगह मेरा घूमा हुआ है। मेरे अन्दर विचित्र उथल-पूथल सी मच गई। मैंने हड़बड़ा कर कहा मुझे भी साथ ले चलिए न! किशोरी दीदी सहज भाव से कहा हाँ चलिए हमलोगों के लिए भी अच्छा होगा। लेकिन कैसे? इतनी लम्बी यात्रा के लिए न मेरे पास पैसे है और ना ही तैयारी, किशोरी दीदी ने फिर सहजता से कहा पैसे की व्यवस्था मैं कर देती हूँ और तैयारी में पहनने के कपड़े आप रख लें बाकि हमलोग है न।
मैंने भी न आव देखा न ताव जुट गई तैयारी में साथ ही मेरे बच्चे भी मेरे स्वभाव से अवगत थे, सबों ने मुझे प्रोत्साहित किया और मैं चल पड़ी तीर्थ यात्रा पर।
दिनांक 6-सितम्बर-2002 दिन मंगलवार को जब मैं मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन पर पहुँची तो (पवन एक्सप्रेस) गाड़ी स्टेशन पर लग चुकि, पर किशोरी दीदी या उनकी बेटी कहीं दिखाई नहीं पड़ रही थी, बाकि साथियों को मैं पहचानती भी न थी। मैं और मेरी दो बेटी पूरी गाड़ी का चक्कर लगा रहे थे। अंततः सिंगनल होने के बाद किशोरी दीदी की टोली सहित दिखाई दी और सभी लोग हड़बड़ा कर एक बोगी में चढ़ गये मेरी दोनों बेटी ने सहारा दिया तथा मेरी सहयात्रीयों के भी परिवार से अपने, उन्हें विदाई के लिए आये थे, सबों ने मिलकर हम सात तीर्थ यात्रीणीयों को विदा किया तथा साथ गाड़ी की सीटी के साथ गाड़ी सरकने लगी। गाड़ी ने जब रफ्तार ली तो आपस में परिचय हुआ दो यात्रीणी का एक ही नाम था (सावित्री) दोनो आपस में (बहिनपा) थी एक किशोरी दीदी एक उनकी बेटी गुड़िया एक बूढ़ी मामी और एक उनकी बेटी (द्रोपदी) कुल छः तथा एक मैं शामिल हुई चुंकि मैं स्कूल में शिक्षण कार्य करती हूँ इसलिए मेरा नाम मैडम जी हुआ।
अब बोगी मे पहले से ही सीट भरी हुई थी फिर भी दो सीट का प्रबन्ध किया गया एक गुड़िया चुंकि सबसे छोटी थी और दूसरी मैडम जी के लिए बाकि सब लोग सीट के नीचे चादर बिछाकर सब एक दूसरे पर उलटते-पलटते 3 बजे प्रथम पड़ाव वाराणसी स्टेशन पर 3 बजे प्रथम पड़ाव था, परन्तु यात्री टीम ऐसी थी जो जहाँ “धर” वहाँ “घर” वाली बात को चरित्रार्थ करना था, इसलिए सभी यात्री किशोरी दीदी के आदेशानुसार प्लेट फार्म पर ही चादर बिछाकर आराम फरमाने लगे।
चिड़ियों की चहचहा-हट के साथ सबेरा हुआ और सभी यात्रीणी अपने-अपने सामान को उठाकर किशोरी दीदी के पीछे चल पड़े। यह काफीला बड़ा महादेव मुहल्ले के बंगला धर्मशाला में रूकी सब अपने-अपने कपड़े संभालें और गंगा नदी में स्नान को चल दिए।
सभी लोग गंगा में स्नान कर गंगा पूजन किए तथा बाबा विश्वनाथ के दर्शन तथा जलाभिशेक कर तीर्थ यात्रिणी धन्य हुए साथ ही सुमित्रा दीदी ने चाँदी के बेलपत्र चढ़ाकर अपनी मन्नत पूरी की। सभी लोग वापस धर्मशाला आये जहाँ घर से जो खाना लेकर गये थे, उसी को सधाना था जो सबों ने एक दूसरे को बाँट कर पेट को तृप्त किया। अब सहयात्रीयों में यहीं से कुछ मन-मुटाव शुरू हो गया, कुछ लोग घूमने के लिए नहीं गये थे वे तो भोला बाबा का पूजन किया, बस यात्रा पूरी परन्तु कुछ लोगों का कहना था कि जब आये है तो यहाँ के कुछ दर्शनीय स्थानों का भ्रमण कर ही लिया जाए फिर टीम दो भागों में बँट गये विषेशकर किशोरी दीदी अपनी बेटी को वो सब कुछ दिखला देना चाहती थी जो उन्होंने खुद देखा था, खैर टीम की एक तिहाई यात्री घूमने निकले उसमें मैं भी थी अब हम लोगों ने मुख्य स्थानों के साथ तुलसी मानस तथा हिन्दु विश्व विद्यालय आदि का भ्रमण कर फिर रात्री सफर आरम्भ हुआ।
दिनांक-08.08.2002 को पवन एक्सप्रेस से हमारी टीम 06:30 में शुक्रवार को विध्यांचल स्टेशन उतरे। सस्ते धर्मशाला की खोज में कुछ समय भटकना पड़ा फिर खत्री धर्मशाला में एक कमरा लिया गया। सबसे बड़ी बात यह थी कि रहने के लिए भी एक ही कोठरी में सब को रहना है। किसी को इधर-उधर या किसी रिश्तेदार-नातेदार के यहाँ नहीं जाना है, इसलिए सब को साथ रहना अनिवार्य है, खैर अब सब लोग यमुना जी के पवित्र जल में स्नान कर सब ने माँ विन्ध्याँचली के दर्शन पूजा किए फिर टोली की कुछ यात्री अपने साथ लाए हुए चूड़ा सत्तु भोजन किए और कुछ होटल में फिर घुमने निकले जहाँ काली खोह तथा अश्टभुजा में माँ काली का दर्शन किया, काली खोह में बन्दरों का स्नेह एक अद्भुत एहसास था। अष्टभुजा माँ का दर्शन कर लौटते समय रात हो गई फिर खाना खाकर सब लोग एक ही कोठरी में सो गये। सुबह-सबेरे उठकर यमुना जी में स्नान किया और माँ बिन्धाँचली का दर्शन पूजा कर फिर यात्रा शुरू हो गयी।
दिनांक-09.08.02 को 01:30 में (महानगरी एक्सप्रेस) से प्रस्थान किया गाड़ी 4बजे शाम को इलाहाबाद स्टेशन पहुँची फिर ओटो रिक्शे से हम सब पवित्र मिलन संगम के तट पर (यात्री धर्मशाला) में ठहरे जब हमारी टीम पहुँची तो पूरा धर्मशाला खाली पड़ा था, बिल्कुल सूना लग रहा था, मुझे तो अजीब सा लग रहा था, सिर्फ महिलाऐं है, कैसे रहेंगे फिर भी उपाय भी नहीं था। किशोरी दीदी, मैडम जी तथा गुड़िया के लिए विषेश व्यवस्था में लगी रहती थी। वैसे तो चाहे गाड़ी का डिब्बा हो या धर्मशाला सभी के मन में वे बातें रहती है कि मैडम जी को कोई असुविधा न हो। तीन दिन तक लगातार सफर करते रहने से थकान का अनुभव हो रहा था। ऑफ सीजन होने के कारण वहाँ आस-पास में भोजन की व्यवस्था नहीं थी, अब क्या होगा? मैंने तो अपनी यात्रा नियति पर छोड़ दी थी, खैर अबकि बार दोनों बहिनपा ने थोड़ी हिम्मत दिखाई और भोजन की खोज में निकल गई तब तक धर्मशाला के आँगन में किशोरी दीदी ने चादर बिछाई और कहा मैडम जी तथा गुड़िया इधर आइए आपलोग इस पर आराम करें। हम दोनों आज्ञाकारी बालक की तरह आकर चादर पर लेट गये, काफी थके होने के कारण तुरंत नींद आ गई । जब भोजन के लिए जगाया गया तो धर्मशाला का दृष्य ही बदला हुआ था, यात्री से खचा-खच भरा हुआ जगह-जगह कमरा से लेकर बरामदा तथा आँगन कहीं गैस का चुल्हा कहीं स्टोव की आवाज सब के सब भोजन बनाने में जुटे है। पूछने पर पता चला कि एक पर्यटक बस में कुछ खराबी होने के कारण यात्रियों को छोड़कर बनने के लिए गई है। खैर जब भोजन के लिए बैठे तो लगा कि आज अन्न के दाना से पेट को तृप्ति मिली दोनों सुमित्रा दीदी (बहिनपा) ने मिलकर सब्जी तथा चावल पकाया था। भर पेट खाना खाकर सबलोग सो गये। 10.08.02 को सुबह उठकर सभी यात्री संगम के तट पहुँचे वहाँ पंडे तथा नाविक के बीच झंझटो के बाद 30रू0 की दर से प्रत्येक व्यक्ति का स्नान कराना तय हुआ और सभी लोग नाव पर बैठ कर संगम जहाँ गंगा, यमुना, सरस्वती का पवित्र मिलन है वहाँ स्नान तथा पूजन किया फिर अपने-अपने डिब्बे में संगम का पवित्र जल भर कर, अक्षयवट का किला घूमे तथा बजरंगबली की सोयी हूई प्रतिमा का दर्शन पूजन किया फिर धर्मशाला लौटे तब तक वहाँ रूके सभी यात्रियों ने भोजन पानी बनाकर रात के खाने का भी इन्तजाम कर तैयार थे और उनकी बस भी तैयार थी वे लोग सबके सब चले गये। हमारी टीम भी अपना-अपना सामान बाँधे और इलाहाबाद स्टेशन पहुँचे 06:30 में (सरयुग लोकल) गाड़ी यात्रियों से खचा-खच भरी हुई थी, यहाँ पर पता चला कि सावन का झूला (मेला) कल ही से अयोध्या में शुरू हो रहा है। अब चिन्ता हो रही थी इस भीड़ में सफर कैसे होगा? कुछ यात्रियों ने ढ़ाढ़स बँधाया और जब गाड़ी आई तो सबो की मदद से किसी तरह हमलोग एक डब्बे में घुस पाये जब घुस गये तो रास्ता कट ही गई और दिनांक-11.08.02 को 3बजे भोर में गाड़ी अयोध्या स्टेशन पर पहुँचा दी। इस समय कहीं भी जाना उचित नहीं था, इसलिए स्टेशन पर ही रात गुजारना पड़ा। पौ फटते ही बन्दरों का उत्पात शुरू हो गया, इस उत्पात से हमारी टीम भी नहीं बच पायी बेचारी सुमित्रा नं0-2 की एक पौलीथीन लेकर बन्दर महाराज स्टेशन के छत पर जा बैठे लाख कोशिश के बाद भी थैला वापस नहीं मिल पाया। उसमें टूथ ब्रस, पेस्ट, साबुन आदि थे। सबने सुबह की चाय पी तथा वहाँ से धर्मशाला की खोज में चल पड़े परन्तु हमारी टीम सीधे सरयुग नदी के तट पर पहुँची और वहाँ सरयुग नदी में स्नान पूजन कर हनुमान नगरी मुहल्ले थे, चन्द्र भवन धर्मशाला में आराम करने लगे जब नींद खुली तो 5 बज रहे थे। सबलोग पास ही में राज भवन मंदिर में दर्शन के लिए गये वहाँ सावन में झूला की तैयारी चल रही थी और भगवान जी को झूला झूलाने के लिए मणि पर्वत पर ले जाने के लिए बाजे-गाजे, शंख-ध्वनि, घंटी-घंटा, श्री राम सीता राम की ध्वनि से पूरा वातावरण गूँज रहा था। सजी-धजी सबारी पर भगवान को लाकर बिठाया गया तथा भजन किर्तन के साथ मणि पर्वत की ओर सबारी चल पड़ी पूछने पर पता चला कि सभी मंदीरों से भगवान जायेंगे मणि पर्वत पर तथा फिर लौट कर अपने-अपने मंदिरमें झूला शुरू होगा। मंदिर के महंथ लोग हाथी तथा घोड़े पर बैठकर चले कुछ सवारी के महंथ गाड़ी से थे। हमारी टीम राज भवन से निकली सवारी के साथ हो ली, और बारात के साथ मणि पर्वत पर गये वहाँ दर्शन पूजा कर प्रसाद लिए फिर वापस धर्मशाला में आकर सबलोग सो गये।
दिनांक-12.08.02 को सुबह नहा-धोकर घुमने के लिए निकले, राम जन्म भूमि, कनक भवन आदि धुमने के बाद जब धर्मशाला में इकठ्ठा हुए तब आगे की योजना बनने लगी। विचार विमर्श के बाद मथुरा जाना तय हुआ। इसके लिए लखनऊ की गाड़ी पकड़ी गई और लखनऊ स्टेशन पर उतरने पर पता चला कि मथुरा के लिए गाड़ी पुराने स्टेशन पर मिलेगी। सबलोग अपना-अपना सामान लादकर पुराने स्टेशन पहुँचे। यहाँ बड़ी लाइन और छोटी लाइन का चक्कर था। अब टिकट कटाने की बारी आई तो टिकट का दाम प्रति व्यक्ति 104रू0 बताया गया। यह बहुत अधिक लग रहा था। यात्रियों ने काना फूसी शुरू हो गई।
आज दिनांक 13.08.02 को सातवाँ दिन था। तीर्थ यात्रा का लगातार सफर के कारण सभी लोग थकते जा रहे थे, पैसे भी कम रहे थे तब जम्मू के टिकट का दाम पूछने पर पता चला कि मात्र 6 (छः) रूपये का अन्तर है। अब तो जम्मू जाना ही बेहतर है, क्योंकि वहाँ 16 किलो मीटर पहाड़ पर चढ़ना है और पहले माँ वैष्णवी का दर्शन करने के बाद ही बाकि तीर्थों की यात्रा होगी। टिकट के बारे में पता चला कि वृद्धो को आरक्षण मिलता है, पूछ-ताछ या टिकट के लिए मैडम जी तथा गुड़िया को ही आगे किया जाता था, क्योंकि पढ़े-लिखे में वे हीं थी, बाकि सब अनपढ़ गँवार आरक्षण में दो ही थी। किशोरी दीदी तथा मामी जी बाकि लोगों को फुल टिकट लगा अब दोपती को गुस्सा आया कि मेरा भी क्यों नहीं आरक्षण टिकट लिया गया, जो होता मैं खुद समझ लेती। खैर अब फिर सब अपने सामानों के साथ बड़ी लाइन स्टेशन पर पहुँच गये, दोनों स्टेशनों की दूरी कोई खास नहीं थी, परन्तु भारी सामान लेकर चलना कठिन था फिर भी अपना सामान खुद ही उठाना था, खैर गाड़ी आई (अमरनाथ एक्सप्रेस) सब लोग किसी तरह गाड़ी में घुस गये और हमारी टीम की खाशियत यह थी कि चाहे भीड़ कितनी भी हो परन्तु सभी सवारियों को ठेल-ठाल कर अपने लिए सीट की व्यवस्था कर ही लेते है। इसिलिए सबके सब आराम से बैठ गये और रात भर झपकी लेते हुए सुबह 9:30 बजे गाड़ी जम्मू तावि स्टेशन पर हमारी टीम अपने अपने लगेज के साथ उतरे न रास्ते का पता न स्थान की जानकारी फिर भी पूछ-ताछ कर सफर तय होता गया।
अब पता चला कि यहाँ से बस द्वारा कटरा जाना पड़ता है और कटरा से माता के दरबार का रास्ता तय करना है। खैर सब लोग सरकारी बस स्टेशन पर पहुँचे। जिनको पहले से जानकारी थी वे सबके सब खुलने वाली बसो में सीट छेककर बढ़ते गये पर हमलोग वही के वहीं थे सामने एक बस दिखी उससे पूछने पर उसने कहा बताया कि मेरी भी गाड़ी कटरा ही जायेगी परन्तु कुछ खराबी आ गई है। आप लोग बैठे में बनबा कर आता हूँ। हमलोगों के पास कोई दूसरा उपाय भी नहीं था, क्योंकि प्राईवेट बस स्टेन्ड कुछ दूरी पर थी और यहाँ कोई दूसरी बस भी नहीं थी। खैर लगभग दो घन्टे इन्तजार के बाद बस ठीक ठाक होकर पहुँच गई। हमलोगां के लिए मनचाहे सीट रिजर्व थी सब लोग अपने-अपने सामानो के साथ आराम से बैठ गये और भी यात्री जो छूट गये थे आकर बैठ गये । पूरी बस भर गई फिर बस कटरा की ओर प्रस्थान की एक से एक खूबसूरत पहाड़ी रास्ता तय करती हुई बस कटरा पहुँची, यहाँ दलालो की भीड़ थी, सभी अपने-अपने धर्मशालो की तारीफ कर रहे थे, परन्तु मुझे गुलशन कुमार का धर्मशाला चाहिए था, खैर वे ही दलाल लोग हम सभी को गुलशन कुमार के धर्मशाला में ले गये।
यहाँ सभी धर्मशालों की नियम अलग है। पैसे नहीं लगते लेकिन माँ वैश्णवी को चढ़ाने के लिए प्रसाद उन्हीं की दूकान से लेनी है। सभी सहयात्री का प्रसाद उसी समय बँधबा दिया गया और एक कार्ड भी धर्मशाला की ओर से दिया गया जिससे माता के दर्शन के लिए लाइन में लगने में सुविधा होगी और हाँ आपलोग अपने-अपने सामानों को पैक कर कमरा खाली कर देंगे, आपके सामान सुरक्षित रहेंगे। माता के दरबार से लौटने पर आपको मिल जायेंगे। खैर शर्त मानने के सिवा कोई रास्ता नहीं था। सब लोग कटरा बाजार में घुमने गये सिर्फ देखना था। खरीदारी लौटने के बाद करनी थी। घूम-घाम के सब लोग आकर धर्मशाला में सो गये। सुबह नहा धोकर सबलोग तैयार हुए और जय माता दी के पवित्र ध्वनि के साथ माता के दरबार की 14 कि0मी0 की यात्रा 9बजे सुबह प्रारम्भ हुई। शुरू-शुरू में तो यात्री साथ-साथ चली परन्तु धीर-धीरे सहयात्री आगे पीछे होने लगे रास्ता बड़ा ही मनोरंजक था हो भी क्यों नही? सारे देश के दर्शनार्थी माता के दर्शन के लिए व्याकुल थे। बच्चे-बूढ़े सभी के मुंह से सिर्फ “जय माता दी”  घोड़े की भी सवारी थी, पालकी पर भी यात्री चल रहे थे और कुछ लोग सिर्फ छोटे बच्चे के लिए सवारी ठीक किए थे, जो उनके बच्चे को पीठ पर लेकर चल रहे थे। कुछ लोग सीढ़ीयों से यात्रा कर रहे थे परन्तु हमारी टोली के सभी यात्री समतल सड़क से ही चल रहे थे, जो आगे बढ़ जाते वे पीछे वालो का इन्तजार बैठ कर करते। रास्ते में खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी, जिसको जो खाना पसंद है अपना खा सकता है, फिर भी एक दूसरे का ख्याल रखना स्वभाविक ही था। इसी प्रकार हमलोग आधा रास्ता तय कर (अर्धकुमारी) तक पहुँच गये।
जीवन में पहली बार पैदल यात्रा वह भी चढ़ाई की बड़ा कठिन था, परन्तु माँ वैश्णव देवी पर पूरा भरोसा था। अब तो वही बेड़ा पार लगायेगी। खैर अर्धकुमारी में सब लोग अपने-अपने इच्छानुसार भर पेट भोजन किए फिर हमलोग देवी अर्धकुमारी के दर्शन की इच्छा व्यक्त किए लेकिन पता चला कि आज नहीं हो पायेगा, आज यदि नम्बर लगा तो कम से कम चार-पाँच घन्टे बाद नम्बर आयेगा दर्शन के लिए। इस पर थकान को देखते हुए सभी यात्री धैर्य खो रहे थे। सबकी राय हुई अब लौटने के बाद ही देवी के दर्शन करेंगे और काफीला भी “जय माता दी” की पवित्र ध्वनि के साथ आगे बढ़ गई। जैसे-जैसे दूरी कम होती यात्रियों के हौषले बढ़ाने के लिए काफी व्यवस्था थी। जगह-जगह ढ़ोल-बाजे के साथ नाचते गाते थकते हुए यात्रियों को कुछ दूर आगे तक जोश बढ़ाते हुए पहुँचा देते और बदले में कुछ पैसे देकर यात्री हँसते-खेलते यात्रा तय होती गई। इसी तरह थक कर चूर होते हुए आखिर सब लोग मंजिल तक पहुँच ही गये, परन्तु सभी सहयात्री पस्त हो चुके थे, फिर संतुष्टि मिली कि पहुँच गये। हमलोग ठहरने के लिए पता लगाये तो एक कार्यकर्त्ता ने पूछा कि आप लोग बिहार से आये है? तो सरस्वती रेस्ट हाउस में चले जाए। इस समय शाम के छः बज रहे थे। सुबह 9बजे कटरा से हमारी यात्रा प्रारम्भ हुई थी और 06:30 में माँ वैश्णव देवी के दरबार में पहुँचे। लगातार साढ़े नौ घन्टे का सफर सबके सब बदहवास लग रहे थ। ठंढ़ भी काफी लगने लगी, हालांकि अगस्त का महीना था, फिर भी ठंढ़ मानो जनवरी, दिसम्बर की 1 कपड़े भी पास में नहीं थे। मात्र एक-एक वस्त्र सबके पास थे। वहाँ पता लगा कि कम्बल मिलता है, निःशुल्क। सरस्वती रेस्ट हाउस के उपर का बरामदा खाली था। मुझे तो वहाँ पहुँचते-पहुँचते काफी बुखार चढ़ गया, लेकिन हमारी सहयात्रीयों ने मोर्चा संभाला । गुड़िया जब कम्बल के लिए गई तो वहाँ बताया गया कि 100रू0 जमा करने पर एक कम्बल मिलेंगे (जमानत के रूप में) और कम्बल लौटाने पर पैसा वापस मिल जायेगा। गुड़िया ने (500)रूपये जमा किए ओर पाँच कम्बल ले आई दो कम्बल फर्श् पर बिछाई गई और तीन कम्बल हम (तीनों) मैं, किशोरी दीदी और गुड़िया ने ओढ़ ली। बाकि लोग भी अपने लिए दो, दो कम्बल लाए और सोया कि कुछ आराम करने के बाद भोजन पानी किया जायेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं जब नींद खुली तो रात को चार बज रहे थे और बरामदा खचा-खच भरा हुआ था।
सुबह हुई सभी के थकान कुछ कम हुआ सबलोग उठ बैठे मुंह हाथ धोया गया, चाय तो सबके लिए आवश्यक था, और सब ने अपने-अपने कम्बल वापस किए। कपड़े लिए नहाने के लिए चले, नहाने की व्यवस्था बहुत ही अच्छी थी, पुरूशों के लिए अलग नहाने का घर था। पानी पहाड़ से सीधे नल के द्वार गिरते हुए षुद्ध पानी में नहाने के बाद रही-सही थकान भी दूर हो गयी।
अब सब लोग माता के दर्शन के लिए लगभग 10बजे सुबह लाइन में लग गये। इस बीच कई जगह पुलिस द्वारा सब की जाँच पड़ताल के बाद धीर-धीरे आगे बढ़ाते गए मन में एक अद्भुत उत्साह और दर्शन को व्यग्रता थी, लगभग दो घन्टे लाइन में बढ़ते-बढ़ते माता के चरणो तक पहुँच पाई और माँ का प्राकृतिक रूप के दर्शन पाकर धन्य हुई। बड़े ही संतुष्टि और शान्त चित से फिर लाइन में ही बाहर निकले। फिर भोजन पानी करने के बाद वापसी की यात्रा प्रारम्भ हुआ। अब वापसी की यात्रा उपर की ओर बढ़ने लगी जहाँ हम लोगो ने भैरोनाथ जी की भी पूजा दर्शन करते हुए पुनः छः घन्टे में ही कटरा पहुँच गये। धर्मशाला के नियमानुसार अपना-अपना सामान लेकर चलते बनिए। लेकिन हमारी टोली भी कोई कमजोर नहीं थी सबने अधिकार जताया कि 8बजे रहे है। अब हमलोग सिर्फ महिलाऐं है कहाँ जायेंगे। आपको रात भर के लिए कमरा देना ही होगा धर्मशाला के कर्मचारी भी तो इन्सान ही थे, उन्हें मानना की पड़ा और सब लोग सो गये। सुबह कमरा खाली कर सब लोग जम्मूतवि के लिए बस पर बैठे और रेलवे स्टेशन पर पहुँच गये। जम्मूतवि स्टेशन पर आकर विचार-विमर्श् होने लगा हरिद्वार के लिए प्रस्थान किया जाये या दिल्ली क्योंकि खरीददारी तो नहीं की गई लेकिन फिर भी सभी जगहों का प्रसाद तथा सिन्दूर टिकुली थोड़ा-थोड़ा ही करने पर सामान भारी हो गया था। अन्त में निर्णय यह हुआ कि पहले दिल्ली चला जाये क्योंकि वहाँ एक रिश्तेदार के यहाँ सामानों को रख कर तब हल्के सामानों के साथ फिर से यात्रा प्रारम्भ किया जाये।
खैर दिन भर रेलवे स्टेशन पर गुजारने के बाद 7:30 में “अमरनाथ एक्सप्रेस” पर सवार हो गये और 16.08.02 को सुबह 5बजे दिल्ली स्टेशन उतरे काफी अन्धेरा होने के कारण स्टेशन के बाहर एक चाय की दुकान के पास अपने सामानो के साथ सब लोग उजाला होने का इन्तजार करने लगे। इस बीच कई रिक्षे वाले गाड़ी वाले ने अनेको सुझाव दिए लेकिन हमारी टोली भी दिल्ली के बारे में सुन चुकि थी, किसी के बातों पर ध्यान नहीं दिए अन्त में चाय वाले ने बताया कि बाजु में ही बस स्टेन्ड है आप लोग वहाँ जाए और वही पर सभी जगहों के लिए लोकल बस मिलती है। बात जँच गई। रिक्षा पर बैठे और बस स्टेन्ड गये वहाँ पूछने पर बस नवम्बर के अभाव में कुछ भटकना पड़ा खैर गोविन्दपुर वाली बस मिली सब लोग बैठ गये और गोविन्दपुर में रोड के किनारे बस वाले ने उतार दिया सामने S.T.D बूथ से फोन करने पर द्रोपदी (घूरपति) दीदी का रिश्तेदार एक लड़का आया और सब को ओटो रिक्षा करके अपने घर गोविन्दपुर में ले गया।
आज 10 दिनों के बाद लगा कि अपनापन का वातावरण मिला नहाने के लिए पानी जी भर के सब लोग नहाये कपड़े भी सब साफ किए गये। अगल-बगल के छत से लोग झाँक-झाँक कर देख रहे थे, कि पूरा छत कपड़ो से भरा हुआ था, फिर नहा धोकर जब तक तैयार हुए गरम-गरम खाना खाया तब तक उ बज चुके थे। समय कम होने के कारण सफर जल्द ही तय करनी थी। सबने एक-एक झोला उठाया और चल पड़े बस के द्वारा हमलोग दाता “निजामुद्दीन” के दरगाह पर गये क्योंकि अजमेर शरीफ दरगाह जाने से पहले यहाँ इजाजत लेना जरूरी होता है। इसलिए हमलोग पहले दाता के दरगाह पर गये वहाँ पूजा अर्चना करने के बाद अजमेर शरीफ के बारे में पता चला कि “सरायरोहिला स्टेशन” से गाड़ी मिलेगी। वहाँ पर खड़े कुछ सिपाही तथा उनके अफसर ने पूरी जानकारी देते हुए बताया। अब इतने लोग एक ओटो में कैसे जायेंगे परन्तु हमारी टोली को हर परिस्थिति का सामना करना आता है। सब लोग सात आदमी एक ओटो में सवार हो गये और पहुँच गये। “सराय रोहिला रेलवे स्टेशन” रास्ते में कई जगह ट्रफिक पुलिस मिली हमारी ओटो की ओर आश्चर्य से देखते ही रह जाती, सिर्फ औरतें आगे पीछे भरी हुई, ऐसी सवारी दिल्ली पुलिस या किसी ने पहले नहीं देखा खैर किसी को रोकने- टोकने की हिम्मत ही नहीं होती। खैर गाड़ी आई महिला डब्बा में हमारी सवारी होती और सभी के सीट भी मिलनी ही चाहिए सो सब पूरा हो जाता सुबह अजमेर षरीफ स्टेशन पर उतरने पर पता चला कि दाता के दरबार में जाने के लिए “औलिया सागर” में स्नान जरूरी है। हमारी टोली सीधे औलिया सागर का रास्ता पकड़ा रास्ते में कुछ दुकानें खुली तो रंग-बिरंगी राखियाँ देखकर रहा नहीं गया, हमने दर्जनों राखियाँ जो चाँदी और कच्चे सूत से बनी थी। औलिया सागर में बहुत कम पानी बचे थे, बहाब के बिना उसका रंग हरा हो गया था, और तल में पूरे कीचड़ थे, फिर भी उसी में नहाना और दाता के दरबार में गये वहाँ माथा टेका चिरागी दी वहाँ से निकलने पर मिठी नीम के पेड़ वाले बाबा के मजार पर गये। यह स्थान पूरे रोड़ा पत्थर वाले रास्ता होकर जाती है। चलने में काफी कठिनाई हो रही थी, कारण कि सभी सहयात्री वैश्णव देवी के दरबार से लौटे थे। यहाँ मालुम हुआ कि तारागढ़ और भी आगे पहाड़ पर है। यहाँ जाने में सबों ने हिम्मत हार दी खैर सबलोग बस स्टेन्ड लौट आये और वहाँ से पुश्कर के लिए बस पर बैठे।
पुष्कर का बस भाड़ा मात्र छः रूपया था, यहाँ पहुँच कर सब ने अपने-अपने पुर्खों को तर्पण दिया, कबूतरों को दाना खिलाया मछलियों को क्रीड़ा का आनंद एक अविस्मरणीय एहसास था? फिर माला फूल और प्रसाद के साथ मंदिरमें सृश्टी के रचयिता ब्रहमा जी की पूजा अर्चना की। यहाँ खाने में मलाई, राबड़ी, मिठाई आदि की काफी दुकानें देखने को मिली। अब यात्रा को आगे बढ़ाने के लिए अजमेर षरीफ रेलवे स्टेशन जाना आवश्यक था, इसलिए सब लोग यहाँ पहुँच गये वहाँ से।
जयपुर के लिए गाड़ी पकड़ी गई और रात के दो बजे जयपुर रेलवे स्टेशन पर उतर गये। महिला बोगी एकदम अन्त में लगी थी, इसलिए स्टेशन के अन्तिम छोड़ पर हम लोग उतर गये किसी को भी जानकारी नहीं थी। सब लोग इधर-उधर हो  गये फिर रात का समय था फिर सब लोग तो मिल गये परन्तु द्रोपदी दीदी नहीं मिली। भीड़ में किधर बहक गई सब के सब बारी-बारी से खोजने लगे कहीं पता नहीं उनकी माता जी जोर-जोर से रोना शुरू कर दी, फिर उन्हें समझा बुझाकर ढ़ाढ़स बँधाया और विश्राम गृह में लेकर गये वहाँ बहुत से यात्री मौजूद थे। हम लोगों को देखते ही समझ गये। कइयों ने पूछ बैठा आप लोग बिहारी है? हमलोगों ने कहा हाँ-हाँ क्या बात है। हाँ तो एक बिहारी महिला आप लोगों को बड़ी बेसब्री से खोज रही है। हमलोगों को राहत मिली कि चलो द्रोपदी दीदी यहि पर है। फिर हम लोगों ने भी कहा हाँ-हाँ हम लोग भी उन्हीं को खोज रहे है। खैर संयोग था कि हमलोग उधर खोजने जाते और द्रौपदी दीदी इधर चली आती कई बार भूल-भूलइया के बाद हमलोग मिल गये। अभी सबेरा होने में काफी समय था, इसलिए यहि पर चादर बिछाई गई और सब लोग आराम फरमाने लगे।
सबेरा हुआ ओटो वाले से भाड़ा तय कर हमलोग जयपुर घुमने चले। जयपुर में हवा महल, बिड़ला मन्दिर, जन्तर-मन्तर और कुछ मुख्य स्थान घुमने के बाद पुनः रेलवे स्टेशन वापस आ गये।
अब आगे की यात्रा प्रारम्भ हुई और दिनांक-19.08.02 को शाम छः बजे मथुरा स्टेशन पर उतरे इस स्टेशन पर यात्रियों के स्वागत के लिए पंडो की बड़ी जमात तैयार रहते है। यात्री को गाड़ी से उतरते देर नहीं कि पंडे लोग अपना पोथी-पतरा, खोल कर तैयार खैर उसमें एक पंडा जी को हमारी टीम पर कब्जा करने में सफलता मिल गई और एक तागे वाले को आदेश दिया कि इनलोगों को ले जाकर सुरक्षित पहुँचा दो हाँ रास्ते में किसी तरह की दिक्कत नहीं होनी चाहिए और तांगे वाले सब को ताँगे पर बिठाकर आदेश का पालन करते हुए सीधे काषी बाई धर्मशाला में ले जाकर सब को उतारा वहाँ पहले से उपस्थित एक आदमी सेबोला साहब भेजे है, इन्हें एक कमरा दे दीजिए। पंडा जी का आदेश था कि आप लोग जल्दी से तैयार रहिएगा नहीं तो मंदिरपट बन्द हो जायेगा।
हमलोगों ने भी आदेश का पालन किया और भोजन पानी की चिन्ता छोड़ जल्दी से मुंह हाथ धोकर कन्हैया के दर्शन को व्यग्र हो उठे। पंडा जी भी समय पर पधारे और आगे-आगे पंडा जी पीछे-पीछे सभी यजमान थे। हमारी टीम के अलावा और भी कई गिरोह उनके कब्जे में था। खैर काशीचाई धर्मशाला और कन्हैया के मंदिरजाने के रास्ते में एक छोटा सा भगवान षंकर जी का मंदिरथा। जिसका दृश्य अद्भूत था, पूरे मंदिरको जिन्दा साँपो से सजाया गया था। सबलोग इस सजावट को आष्चर्य से देख रहे थे। खैर समयाभाव के कारण पंडा जी आगे बढ़ गये सब लोग पीछे दौड़े और राधा कृश्ण के मंदिरमें पहुँचे सावन का महिना था, मंदिरका सजावट देखते बनता। तीर्थ यात्रियों की भीड़ भी काफी थी, हमलोगों की टोली धक्कम-धुक्की में सबसे आगे थी, इसलिए आरती में भी आगे रहीं। आरती के साथ प्रसाद भी लेकर सब लोग वापस लौट पंडा जी ने एक होटल के ओर ईशारा किया और होटल मालिक से कहा ये लोग हमारे यजमान है, ठीक से गर्म-गर्म खाना खिलाइएगा और स्वयं चलते बने। हमलोगों को भूख से हालत खराब हो रही थी, सब लोग हड़बड़ा कर अपनी-अपनी सीट पकड़ लिए खाना भोजन का इन्तजाम था। समय बीतने के बाद खाना आया और सबने खाना खाया।
आज तीर्थ यात्रा का अंतिम दिन था सब लौट कर दिल्ली चले गये क्योंकि भारी सामान दिल्ली में ही छोड़कर आये थे, परन्तु मेरा रास्ता बदल गया मैं मथुरा से ही बस द्वारा अलीगढ़ रेलवे स्टेशन पहुँची, किसी प्रकार रेलवे कर्मचारी ने टिकट की व्यवस्था कर दिया और मैं मुजफ्फरपुर पहुँच गई।
   
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